Tuesday, April 17, 2012

आज भारत के हालात चाहे कुछ भी हों! हमें मायूस नहीं होना है ! ये हालात बदलने हैं ! अगर हम अंग्रेजों के चंगुल से इस देश  को छुड़ा सकते हैं तो इसे दुनिया का सबसे अच्छा रहने लायक स्थान भी बना सकते हैं!
तो हमारी  क्या योजनाये हैं और क्या चुनोतियाँ हैं ! और उनके क्या समाधान हैं!
सबसे पहले क्या ?  चाहते हैं हम!

देश के सविधान के अक्षरक्ष अमल के इलावा हमारा उद्देश्य है की इक ऐसी व्यव्स्था हो की एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति का शोषण न कर सके !
हमारे सपनो के भारत में साथियों ......................... (आप सभी के विचार आमंत्रित हैं)

Monday, April 16, 2012

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी  धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य  बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सबमें,
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता  सुनिश्चित कराने वाली, बंधुता बढ़ाने के लिए,
दृढ़ संकल्प होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ईस्वी (मिति माघशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद़ द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।


Sunday, March 25, 2012

साथियों हमें हर गाँव में सेना बनानी है!
ऐसे लोगों की जो अपने बच्चो को अच्छा घर ही नहीं अच्छा देश भी देना चाहते हैं
वो सेना एक इन्टरनेट सर्वर के जरिये आपस में जुडी रहेगी!
और देश के सविधान का उलंघन करने वालों के खिलाफ लड़ेगी
चाहे वो कोई अफसर हो नेता हो या कोई आम आदमी
क्या ऐसा हो पायेगा आपकी क्या राय है ?

Friday, March 23, 2012

देश को चलने के लिए केवल 544+544+12=1100 बन्दे चाहियें क्या बहुत ज्यादा हैं ? नहीं न फिर क्यों देश सही नहीं चल रहा है और चल भी नहीं सकता, जब तक ये लोग अपने बच्चो को विदेश में पढ़ाएंगे कोई भी योजना केवल जाती, धर्म के आधार पर बनाएगे इन्साफ मैं देर लगाएँगे हमें धर्म के नाम पर लड़ायेंगे केवल वोट मांगने गलिओं मैं आएंगे, कुछ भी सुधर करना हो तो सिखने विदेशो मैं जाएँगे और हम इन्ही को चुनते जाएँगे क्या आप इन 1100 में से एक हो सकते हैं ? पर शर्त ये है की बन्दे चाहिएं हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई या पारसी नहीं जाट गुर्जर राजपूत या यादव भी नहीं पंजाबी गुजराती या मराठी भी नहीं चाहियें तो सिर्फ और सिर्फ बन्दे, इंसान , ईन्सनिअत जिनमे कूट - कूट कर भरी हो जो गाँधी जी की सहनशक्ति भगत सिंह का जज्बा सुभाष चंदर बॉस जैसी नेत्रत्व शक्ति और अपने सपनो पर विश्वाश रखते हो क्या आपमें है ये सब , तो ज्वाइन कीजिये एक नयी शुरुवात देश को सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाने की!
आज देश के हालत एक अदद क्रांति के लिए सर्वथा अनुकूल हैं ! बाबु की कलम से लेकर लड़ाकू विमान तक सब सम्मान खो चुके हैं ! स्कूल अध्यापक से लेकर रास्त्रपति तक धूर्त और उद्देश्यहीन हो चुके हैं !

देश की सबसे सशक्त इकाई समाज व्यक्तियों से मिलकर बना है , व्यक्ति कमजोर होंगे तो समाज भी कमजोर होगा और व्यक्तित्व की नीवं बचपन से ही आरंभ होती है!

आज देश का बच्चा होश सँभालते ही अँधा अनुकरण और भोतिक वस्तुओं के लिए तड़प और होड़ देखता है तो वो भी अपने मां बाप की तरह चटक पक्षी की तरह फरफराने लगता है ! किसी किसी घर में ही आवश्यक निति ज्ञान बच्चे को मिल पता है!

आगे का कार्य स्कूल देखते हैं सरकारी स्कूलों में अध्यापक पढ़ाने से ज्यादा बच्चे को डराने या बेगार करवाना अपना अधिकार समझाता है ! पढाता हैं तो डंडा दिखाकर , बच्चे का रट्टू तोता बना देते हैं ! और जो नहीं रटते उन्हें कमजोर बच्चा कहकर हीन भावना का शिकार बना दिया जाता है!

ऐसे देश में जिम्मेदार नागरिक कैसे बनेंगे कैसे ?

Wednesday, March 7, 2012

चुनाव हुआ CM बदला क्या फरक पड़ेगा जो अफसर पैसा ला ला कर मायावती जी को देते थे अब मुलायम जी को दे देंगे
देश में लोकतंत्र के नाम पर एक ठेकेदारी प्रथा चल रही है ! जो ज्यादा बोली लगता है जैसे ज्यादा आरक्षण ज्यादा माफ़ी ज्यादा वाडे ज्यादा दारु वो ठेका ले लेता है ! फिर पांच साल तक वही से कमाता है ! और उन्ही को बांटता है पैर धुलवाता है ! और पता नहीं क्या क्या !

लोकतंत्र की कामयाबी के लिए जरूरी है की सभी लोग व्यवस्था को समझने वाले हो देश का भला बुरा और जरूरत को अच्छी तरह समझते हों !
एक सो इक्कीस करोड़ लोगों को कौन समझाएगा ??
सरकार यानी ठेके दार पर क्यों !
उसे पता है जिस दिन ये लोग समझ गए वो जेल में जाएगा ! वो तो नहीं कभी नहीं!
तो अपने अपने जरिये से लोग समझ रहे हैं और समझा भी रहे हैं देश के लोग जो जागरूक भी है समस्या को एक दुसरे पर थोप रहे हैं ! कोई धार्मिक तो कोई जातीय नजर से समस्या को देख रहा है तो कोई किसी और अच्छे ठेकेदार को तलाश रहा है ! पर बहुत कम इतने से काम नहीं चलेगा पूरे देश को एक ही झटके में न केवल समझाना पड़ेगा बल्कि उन्हें करके दिखाना होगा की अंतर कैसे आ पायेगा! और अंतर आने तक पहरा देना होगा की कोई उन्हें गुमराह न कर पाए!

हमें सभी गाँवों में कम से कम पांच से दस साथी चाहियें जो देश के लिए बिना किसी लालच के अपना बहुमूल्य समय दे पाएं !

Tuesday, February 14, 2012

इस दुनिया में अनेक धर्म हैं और भारत में भी हैं पर कई लोगों को अपना धर्म अच्छा और बाकी सबका बुरा लगता है!
क्यों ?
ये तो मनोविज्ञान का प्रश्न है हर कोई अपने जैसे लोग बढ़ाना चाहता है शायद, पर नहीं अमीर तो नहीं चाहते की और लोग उसकी श्रेणी में आएं, कोई लाभ वाला बिज़नस करने वाला ये नहीं चाहता की कोई उसकी तरह दूकान खोले या फेक्टरी लगाए अगर किसी को सोने की खान का पता चल जाए तो वो किसी को नहीं बताता की खान कहाँ है !

पर अगर किसी को कोई गलत या अनैतिक कार्य करना हो तो वो अवश्य चाहता है की ज्यादा से ज्यादा लोग उसके जैसे हों ! शराबी चाहता हा की सब पियें ! जुआरी चाहता है की सब जुआ खेलें ! या कोई डर के मारे कोई कार्य करता है तो वो चाहता है की ज्यादा लोग उसके साथ आये जैसे अगर किसी गाँव में चोर आ जाएँ और किसी घर में छुप जाए तो कोई अकेला नहीं जाता वहां वो चाहता है की सारा गाँव चले

तो ये धर्म के ठेकेदार हमेशा क्यों चाहते है की ज्यादा लोग इनके धरम को अपनाए ! क्यों जरा गौर करें खुद से ही सवाल करें और खुद ही जवाब दें !
धर्म का क्या स्रोत है ,डर या अनैतिकता ? ज्यादातर धर्म इस धारना पर टिके हैं की इस धर्म के लोगों को स्वर्ग में स्थान मिलेगा किसे मिलेगा उसी व्यक्ति को जो उस धर्म में रहेगा उसके अनुसार चलेगा और ज्यादा लोगों को उससे जोड़ेगा किसी दुसरे को नहीं किसी रिश्तेदार को नहीं सिर्फ उसी को !
तो क्या धर्म एक निहायती व्यक्तिगत विषय नहीं है ? अगर उस धर्म में यह निर्देश न हो की उसका प्रचार करने से बोनस पॉइंट मिलेंगे ?

आज से करीब २००० साल पहले दुनिया में सभ्यता बहुत छिन्न भिन्न थी छोटे छोटे काबिले थे उनके सरदार थे जो ज्यादातर शारीरिक शक्ति के आधार पर चुने जाते थे जैसे आज भी सभी झुण्ड में रहने वाले जानकारों में होता है।

दिमाग का विकास हुआ तो कुछ लोगों ने साम दाम दंड भेद की खोज कर ली शारीरिक शक्ति के इलावा लोगों को समझाकर कोई लालच देकर डराकार या गुमराह कर अपने साथ रखने लगे और जिसके साथ ज्यादा लोग वो राजा
एक बार राजा बन जाने से समस्या समाप्त नहीं होती थी राजा के जरा सा कमजोर पड़ते ही उसे मार दिया जाता।

तो ईश्वर की इजाद भी किसी ने कर ही दी राजा उसका प्रतिनिधि है। भगवान एक सर्वशक्तिमान जो अनुचित कार्यों की सजा देता है और अच्छे कार्य का इनाम
लोगों ने देखा और कुछ बुद्धिजीवी व्यक्तियों ने देखा की फलां ने अनुचित कार्य किया और सजा नहीं मिली वो तो मजे में है! तो अगले जनम और पिछले जनम की भी खोज हुई ! बोला सजा अगले जन्म में मिलेगी अगर किसी को दुःख हुआ और उसने पूछा की मैंने तो कोई पाप नहीं किया तो उसे कहा गया पिछले जन्म की सजा है !
२००० साल ऐसे ही बीत गए इंसान ने ब्रह्माण्ड को छान मारा इश्वर की क्रोप कही जाने वाली बीमारियों पर विजय हुई !

इस दौरान न जाने कितने धर्म बने और बिगड़े कुछ कम फैले कुछ ज्यादा पर सभी धर्मों की मान्यताये देखकर उन हालात का अनुमान लगता है जिनमे वो पनपे हैं !
21st शताब्दी का धरम लोकतंत्र है ! जिसमे सभी समान हैं और समान अधिकार रखते हैं ! कोई किसी पर राज नहीं करता और न ही शोषण कर सकता है !

परन्तु कुछ शरारती तत्व ऐसे भी हैं !
जो इस लोकतंत्र के खिलाडी हैं और नए नए तरीके से राजा बने हुए हैं ! पर ज्यादा दिन तक नहीं ।
जो अभी भी वोही पुराना स्वर्ग का लालच दिखाकर और नरक से डराकर राज करने की इच्छा रखते हैं ! पर आज वैज्ञानिक युग के लोग स्वर्ग पाने में नहीं स्वर्ग बनाने में यकीन करेंगे और और बना लेंगे।
Sahab Singh at 8:16 AM
Tuesday, February 14, 2012